Wednesday, September 3

कीड्यांनो...

काळोखात किर्कीरणाऱ्या कीड्यांनो,
तुम्ही कधीपासून स्वतःला,
अंधारातल्या शिकारी घुबडाचा
बाप समजून घेतलात?
गरुडाची सावली ढगांवर पडते,
जमिनीवर नाही
हे विसरलात तुम्ही कीड्यांनो..
वणवा रात्रीचा सुंदर दिसतो म्हणून
जवळ येण्याचा प्रयत्न करू नका..
आम्ही जळत आहोत, तुम्ही भस्म व्हाल..
भडव्यांच्या भाषेला प्रत्युत्तर म्हणून
आम्ही भडवे बनणार नाही..
तुमच्या जाती तुम्हांस लाख मुबारक...
कीड्यांनो...

Tuesday, September 2

ज़िन्दगी

सवाल हैं वजूद का या जवाब है ये ज़िन्दगी
या मौत से छिपने का नक़ाब है ये ज़िन्दगी

उल्फत में हों अगर तो आखें क्यों भीगी है
देखता हु तो लगता है ख़फ़ा है ये ज़िन्दगी

लम्बी उम्र की क्यों मांगते है दुआ लोग
सुनता हूँ तो लगता है रफ़ा हैं ये ज़िंदगी

रहत उसकी साँसों में किस चीज की है आखिर
महसूस करू तो लगता है दगाह है ये ज़िन्दगी

आखरी पन्ना किताब का फाड़ दिया है किसीने
पढता हूँ तो लगता हैं गुनाह है ये ज़िन्दगी

मुझे देखके कहते है जी रहा है "मुसाफिर"
जीता हूँ तो लगता है सज़ा हैं ये ज़िन्दगी...

Wednesday, August 27

भीड़

इश्क़ की अपनी तक़दीर हुआ करती है..
दिल पे किसी की तहरीर हुआ करती है..

निगाहे नम और होंठो पे हँसी की लकीर..
उनकी महोब्बत जाहीर हुआ करती है..

कभी पलट के देखना पुरानी किताब के पन्नें..
छिपी हुई कोई तस्वीर हुआ करती है..

यु ही कोई बर्बाद नहीं हुआ करते..
हर रांझे की कोई हीर हुआ करती है..

आशिक़ के घर जाओ तो गुम न होना मुसाफिर...
मैकदो में अक्सर भीड़ हुआ करती है...

Wednesday, August 20

तमाशा

आज अहमियत अपनी दिखा रहे है लोग
बिन बुलाये मुझसे मिलने आ रहे है लोग...

जब ज़रूरत थी किसी ने हाथ तक न दिया
आज मुझे कंधो पे उठा रहे हैं लोग...

मुझे परायी नज़र से देखा करते थे सब
दिल खोलके अपनापन जता रहे हैं लोग...

हर देखनेवाले की आँखे अब नम है...
मैं सो रहा हु मुझपे रो रहे है लोग...

रोज़ मेरी खामियाँ गिना करते थे जो
मेरी ख़ूबियाँ आज सबको बता रहे हैं लोग...

ज़िन्दगी के तमाशे में थोड़ी कसर थी "मुसाफिर"
जो मेरी मौत का भी तमाशा बना रहे है लोग...

Sunday, August 10

मला जगायचं होतं

काही क्षण निवांत बसायचं होतं...
आठवून दु:ख पुन्हा हसायचं होतं...

आसवांची किंमत समजली होती...
अक्षांमधेच कुठं लपवायचं होतं...

दिवसाची किलबिल नेहमीचीच होती...
रात्रीच्या किर्कीरीत जागायचं होतं...

मी जगावेगळा नाही हे समजलं जेव्हा...
माझं वेगळं जग मला बनवायचं होतं...

जेवढा लढलो तेवढ्या जखमा...
श्वास होता आणखी लढायचं होतं...

मज मारण्याची मरणाची औकात नव्हती...
मी जगलो जिथवर मला जगायचं होतं...
...........................................मी...